यदि देश का कोई नागरिक देश के संसाधनों का
उपयोग करता है तो उस नागरिक का यह कर्तव्य है कि जरुरत पड़ने पर देश की सेवा के लिए
भी तैयार रहे. लेकिन कुछ लोग देश के संसाधनों का उपयोग देश के खिलाफ ही करने लगते
हैं. इसलिए ऐसे लोगों को देश का हितैषी नहीं कहा जाता है. हालाँकि यह भी सच है कि
बहुत से लोग यह नहीं जानते कि आखिर कौन से काम देशद्रोह की श्रेणी में आते हैं. इस
लेख में ऐसे ही कार्यों के बारे में बताया जा रहा है जो कि देशद्रोह के अंतर्गत
आते हैं.
भारत में देशद्रोह कानून का इतिहास
देशद्रोह कानून को भारत में सबसे पहले 1837
में थॉमस मैकॉले द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 113 के माध्यम से
पेश किया गया था. अंग्रेजों को इस कानून की जरुरत इसलिए पड़ी थी क्योंकि भारत के
विद्रोही गुट लगातार अंग्रजों के शासन के खिलाफ देश में धरना और प्रदर्शन कर रहे
थे. अर्थात अंग्रेज; उनकी हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले भारतीय
स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डालने के लिए देशद्रोह का कानून लाये थे.
ध्यान रहे कि 1860 की मूल भारतीय
दंड संहिता में देशद्रोह का कानून मौजूद नहीं था लेकिन 1870 में ब्रिटिश
सरकार ने भारतीय दंड संहिता में संशोधन किया और धारा 124 ए को इसमें जोड़
दिया था. इस प्रकार हम कह सकते है कि भारत में देशद्रोह के कानून ने 1870
में जन्म लिया था.
वर्ष 1898 में मैकॉले दंड
संहिता के तहत देशद्रोह का मतलब था, ऐसा कोई भी काम जिससे सरकार के खिलाफ
असंतोष जाहिर होता हो लेकिन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इस
परिभाषा में बदलाव किया गया जिसके तहत सिर्फ सरकार के खिलाफ असंतोष जाहिर करने को
देशद्रोह नहीं माना जा सकता बल्कि उसी स्थिति में इसे देशद्रोह माना जाएगा जब इस
असंतोष के साथ हिंसा भड़काने और कानून व्यवस्था को बिगाड़ने की भी अपील की जाए.
देशद्रोह से जुड़े कानून;
ऑक्सफोर्ड एडवांस्ड लर्नर डिक्शनरी के अनुसार,
देशद्रोह
शब्द का अर्थ है, "यदि कोई व्यक्ति "शब्दों या
कार्यवाही" के माध्यम से सरकार का विरोध करने के लिए लोगों को भड़काता है तो
ऐसा कार्य देशद्रोह की श्रेणी में आता है."
मार्च 2015 में सुप्रीम
कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66ए को निरस्त करते समय साफ किया था कि
लोगों को कुछ भी कहने या लिखने की आजादी नहीं है अर्थात संवैधानिक सीमाओं के बाहर
लिखी गई बातों के लिए उचित कार्रवाई हो सकती है.
संविधान के जानकार सोली सोराबजी ने कहा है कि
सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं है बल्कि उस विद्रोह के कारण हिंसा और कानून और
व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो जाए तभी देशद्रोह का मामला बनता है. सोराबजी ने यह
भी कहा है कि पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाना भी देशद्रोह नहीं है लेकिन भारत के
टुक़ड़े होंगे जैसे नारे देशद्रोह की श्रेणी में आते हैं.
भारत में देशद्रोह के फेमस मामले
देश में 2014 से 2017 की
अवधि में देशद्रोह के मामलों में 165 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. क्राइम
रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2014 में देशद्रोह के 47
मामले दर्ज किए गए जिसमें 72 फीसदी मामले सिर्फ बिहार-झारखंड में
दर्ज है.बिहार, झारखंड में इन आंकड़ें के लिए नक्सलवाद को
जिम्मेदार माना जाता है.
भारत में देशद्रोह के कुछ चर्चित मामले इस प्रकार हैं;
1. वर्ष 2016 में जेएनयू में
देश विरोधी नारे लगाने के आरोपी कन्हैया कुमार और अन्य पर देशद्रोह का मामला दर्ज
किया गया लेकिन बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरोप सिद्ध ना होने के कारण जमानत
दे दी थी.
2. सितंबर 2012 में
काटूर्निस्ट् असीम त्रिवेदी को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय साइट पर संविधान
से जुड़ी तस्वीरें पोस्ट करने की वजह से इसी आरोप में गिरफ्तार में किया गया था.
हालांकि बाद में उनके ऊपर से देशद्रोह का आरोप हटा लिया गया था.
3. 2010 में अरुंधति रॉय और हुर्रियत नेता सैयद अली
शाह गिलानी पर कश्मीर-माओवादियों के पक्ष में एक बयान देने की वजह से देशद्रोह के
तहत मुकदमा दर्ज किया गया था.
4. वर्ष 2007 में बिनायक सेन
पर नक्सल विचारधारा को फैलाने के आरोप में देशद्रोह का मामला दर्ज कर आजीवन
कारावास की सजा सुनाई गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जमानत
मिल गई थी.
कानून के जानकारों का कहना है कि देशद्रोह की
परिभाषा काफी व्यापक है और इस कारण इसके दुरुपयोग की संभावना से भी इनकार नहीं
किया जा सकता. इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सीआरपीसी की धारा-196
में प्रावधान किया गया कि देशद्रोह से संबंधित मामले में पुलिस को चार्जशीट के
वक्त मुकदमा चलाने के लिए केंद्र अथवा राज्य सरकार से संबंधित प्राधिकरण से मंजूरी
लेना जरूरी है.
आइये जानते हैं कि कौन-कौन से मामले देशद्रोह की श्रेणी में आते हैं;
1. सुप्रीम कोर्ट के वकील डी. बी. गोस्वामी ने
बताया कि देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल संगठन को बैन कर दिया जाता है. इसके तहत
ही माओवादी और दूसरे अलगाववादी संगठनों को बैन किया गया है. आमतौर पर ऐसे संगठनों
से संबंध रखनेवालों के खिलाफ देशद्रोह या इससे संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज
होता है. इसी कारण हाल के समय में कुछ यूनिवर्सिटीज के प्रोफेसर को भी गिरफ्तार
किया गया है.
यह जानना जरूरी है कि अगर कोई संगठन देश-विरोधी
है और उससे अनजाने में भी कोई संबंध रखता है, उसके साहित्य को
और लोगों तक पहुंचाता है या ऐसे लोगों का सहयोग करता है, ऐसे लोगों के
साथ किसी भी तरह की सांठ-गांठ रखता है तो देशद्रोह का मामला बन सकता है. इसलिए
लोगों को अनजाने में भी किसी को ऐसे संगठन या ऐसी विचारधारा वाले लोगों से संपर्क
नहीं रखना चाहिए.
2. देश विरोधी गतिविधियों के लिए अपराध के हिसाब
से धाराएं लगाई जाती हैं लेकिन देशद्रोह के लिए आईपीसी की धारा-124 ए
में कड़े प्रावधान किये गए हैं. इसके लिए उम्रकैद तक हो सकती है. इसके तहत देश के
खिलाफ लिखना, बोलना या संकेत देकर या फिर अभिव्यक्ति के
जरिये विद्रोह करना या फिर नफरत फैलाना या ऐसी कोशिश करना या ऐसी कोई भी हरकत जो
देश के प्रति नफरत का भाव रखती हो, वह देशद्रोह कहलाएगी.
हालाँकि आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा-124
A के
दायरे में स्वस्थ आलोचना नहीं आती. इस धारा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ फैसले
सुनाए हैं और उससे साफ होता है कि कोई भी हरकत या सरकार की आलोचनाभर से देशद्रोह
का मामला नहीं बनता, बल्कि उस विद्रोह के कारण हिंसा और कानून और
व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो जाए तभी देशद्रोह का मामला बनता है.
3. आईपीसी की धारा-121 में देश के
खिलाफ युद्ध छेड़ने वालों (आतंकवादी गतिविधियों में शामिल) को सजा दिए जाने का
प्रावधान है. अगर कोई शख्स भारत के खिलाफ युद्ध करता है या ऐसी कोशिश करता है या
ऐसे लोगों को बढ़ावा देता है तो 10 साल या उम्रकैद से लेकर फांसी तक की
सजा हो सकती है.
4. आईपीसी की धारा-122 में प्रावधान
है कि अगर कोई व्यक्ति देश में रहकर, भारत के खिलाफ युद्ध करने की नियत से
हथियार जमा करने, बनाने या छुपाने की कोशिश करता है तो आरोपी को
दोष साबित होने पर 10 साल तक कैद या उम्र कैद की सजा हो सकती है.
ऐसे लोगों का साथ देने वालों के लिए धारा-123 में 10
साल तक की कैद का प्रावधान है.
इस प्रकार ऊपर दिए गए सभी कानूनों में एक बात
स्पष्ट है कि सरकार का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करना या बदलाव की मांग करना हर
नागरिक का अधिकार है. अर्थात लोगों को संविधान के दायरे में रहकर सरकार की आलोचना
करने की पूरी आजादी है, क्योंकि यदि जनता किसी सरकार को चुनती है तो
उसकी आलोचना भी कर सकती है. लेकिन देश की सत्ता को गैरकानूनी तरीके से चुनौती देना
देशद्रोह की कैटेगरी माना जाएगा.

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