नई दिल्ली : भोपाल की गैस त्रासदी पूरे भारत का ही नहीं बल्कि विश्व का भी सबसे बड़ा औद्दोगिक सबसे दुर्घटना है, बात 3 दिसबंर 1984 की है, जब आधी रात के बाद यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली जहरीली गैस ने हजारों लोगो की जान ले ली थी। शहर के ठीक बाहर बने यूनियन कार्बाइड के कारखाने में तब रात के ठीक 12:00 बजे थे तभी कारखाने से अचानक काले रंग का एक गुवार उठा और फिर देखते ही देखते उसने पूरे शहर को अपने कब्जे में कर लिया.
पूरा शहर पागल
और मौत का यह गुबार हवा के सहारे लोगों के सांसो पर उतरना शुरू हुआ, तब पहली बार लोगों को इसकी मौजूदगी का एहसास हुआ, गहरी नींद में सो रहे लोग अचानक चौककर बैठे गये. और फिर उन्हें महसूस हुआ कि जैसे उनका का दम घुट रहा हो, आंखों में जलन हो रही थी, लगता था उनके यहां आंखों में किसी ने मिर्च झोंक दी हो, एक साथ जब पूरे शहर का दाम घुटने लगे तो जाहिर सी बात है पूरा शहर पागल पड़ जाएगा और बस इसी बदहवासी में लोग घरों से निकलने लगे।
लोगों को सांस लेने में हो रही थी दिक्कत
हर कोई शहर छोड़ कर भाग रहा था मगर कमबख्त हवा भी गुआर का साथ दे रही थी, लिहाजा देखते ही देखते जहर भरा गुबार भोपाल की फिजाओं में घुल गया, अब आप अंदाजा लगाअए कि जब पूरी हवा ही जहरीली हो जाए तो भला उसेसे कोई कैसे मुकाबला कर सकता है, तब तक भोपाल के लोगों को ना ही इस जहरीली हवा का नाम मालूम था और ना ही उससे बचाव का तरीका पता था, पूरा शहर खांस खांस कर उल्टियां कर रहा था सांसों के साथ जहरीली गैस फेफड़ों में फैलती गई और लोग सड़कों पर गिरते गए।
हर तरफ लाश ही लाश
मौत के गुबार ने हवाओं का दामन थामा और बहते हुए सांसो में समाता चला गया घर खाली हो रहे थे गली चौराहे मोहल्ले, बेहोश और बदहवास लोगों के साथ साथ मुर्दों से पटे जा रहे थे कोई गिरते हुए भाग रहा था, तो कोई भागते हुए गिर रहा था. किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर शहर की हवा इतनी जल्लाद कैसे हो गई?
यहां तक कि अस्पताल के डॉक्टरों को भी इस गैस का कोई पता नहीं था. इसलिए लोगों का ईलाज भी सही तरीके से हो पा रहा था। और इससे पहले कि सरकार अस्पताल को कोई मदद दे पाती, लाशों के अंबार लगने शुरू हो गए. धीरे-धीरे यह हालत हो गई कि अस्पताल में लाशें रखने की जगह तक नहीं बची. लिहाजा मरने वालों को खुला आसमान के नीचे छोड़ दिया गया.


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